बिलासपुर। रायपुर की पुरानी बस्ती स्थित श्री ठाकुर रामचंद्रजी स्वामी जैतूसाव मठ सार्वजनिक न्यास की संपत्तियों को लेकर महंत राम आशीष दास, निवासी जैतूसव मठ, पुरानी बस्ती, रायपुर, की याचिका छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने खारिज कर दी है।
मृत महंत के बाद कलेक्टर का नाम दर्ज करने का विवाद
जैतूसाव मठ सार्वजनिक न्यास के सरबराकार रहे महंत राम भूषण दास की 16 नवंबर 2007 को मृत्यु हो गई थी। उनका नाम न्यास की संपत्तियों के राजस्व रिकॉर्ड में सरबराकार के रूप में दर्ज था। याचिकाकर्ता राम आशीष दास ने खुद को उनका शिष्य बताते हुए वसीयत, दत्तक ग्रहण पत्र और सरबराकार नियुक्ति संबंधी दस्तावेजों के आधार पर उनके उत्तराधिकारी के रूप में दावा किया।
पहले तहसीलदार ने आवेदन किया था खारिज
इससे पहले तहसीलदार अभनपुर ने 13 अक्टूबर 2010 को इसी तरह के आवेदन को खारिज कर दिया था। तहसीलदार ने माना था कि न्यास के प्रबंधन और रिसीवर की नियुक्ति से संबंधित विवाद पहले से रजिस्ट्रार, जिला अदालत और हाई कोर्ट के समक्ष लंबित हैं। इस आदेश को चुनौती नहीं दी गई।
हाई कोर्ट ने कहा- सुनवाई का अवसर नहीं देना गलती, लेकिन नुकसान साबित नहीं
हाई कोर्ट ने माना कि किसी व्यक्ति के हित को प्रभावित करने वाले राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव से पहले सामान्य तौर पर नोटिस और सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए था। लेकिन कोर्ट ने यह भी देखा कि राम आशीष दास का सरबराकार के रूप में दावा वसीयत और दत्तक ग्रहण पत्र जैसे विवादित दस्तावेजों पर आधारित है और इन दस्तावेजों की वैधता को लेकर पहले से विवाद रहा है।
पांच साल बाद हाई कोर्ट पहुंचे, देरी भी बनी बड़ा आधार
राजस्व मंडल ने 28 अप्रैल 2016 को आदेश दिया था, जबकि राम आशीष दास ने हाई कोर्ट में याचिका 28 अगस्त 2021 को दायर की। यानी आदेश को चुनौती देने में पांच साल से अधिक की देरी हुई। हाई कोर्ट ने कहा कि इस लंबी देरी का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
कलेक्टर का नाम दर्ज होना महंत पद का अंतिम फैसला नहीं
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूजारी उत्थान एवं कल्याण समिति मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि मंदिर या सार्वजनिक धार्मिक संपत्ति के प्रबंधन की भूमिका अपने आप में संपत्ति पर निजी स्वामित्व का अधिकार नहीं देती। इसी आधार पर कोर्ट ने कहा कि कलेक्टर का नाम सरबराकार/प्रबंधक के रूप में दर्ज होना न्यास की संपत्ति पर निजी स्वामित्व स्थापित नहीं करता।






