राज्यों को आर्थिक रूप से पंगु बनाकर केंद्र पर आश्रित करना चाहती है भाजपा सरकार : विनोद चंद्राकर
राज्यों का अधिकार छीनने लाया जा रहा खनिज संपन्न जमीनों व खदानों पर नियंत्रण कानून
महासमुंद। केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा राज्यों के खनिज संपन्न जमीनों व खदानों पर नियंत्रण को लेकर संसद में प्रस्तुत संशोधित कानून के प्रस्ताव को पूर्व संसदीय सचिव छग शासन व महासमुंद के पूर्व विधायक विनोद सेवन लाल चंद्राकर ने राज्यों को आर्थिक रूप से पंगु बनाकर पूरी तरह केंद्र पर आश्रित करने के लिए रची जा रही साजिश का हिस्सा बताया है।
श्री चंद्राकर ने कहा कि खनिज संपदा और खदानों पर राज्यों के अधिकार सीमित करना संघीय ढांचे पर सीधा हमला है और देश के खनिज संपन्न राज्यों के साथ घोर अन्याय है। जिस तरह से माइंस एंड मिनरल्स संशोधन विधेयक के माध्यम से खनिज वाली जमीनों पर टैक्स, रॉयल्टी, सेस और अन्य लेवी लगाने के अधिकार को केंद्र अपने हाथ में लेने की तैयारी कर रहा है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि केंद्र की मंशा राज्यों को आर्थिक रूप से पंगु बनाकर उन्हें दिल्ली के इशारे पर चलाना है।
पूर्व संसदीय सचिव ने कहा कि छत्तीसगढ़, ओडिशा, राजस्थान, मध्यप्रदेश जैसे राज्य देश की खनिज संपदा की रीढ़ हैं। अकेले छत्तीसगढ़ देश के कुल खनिज उत्पादन में 13.52 प्रतिशत का योगदान देता है और यहां के खनिज राजस्व से ही प्रदेश के गांव, गरीब, किसान, आदिवासी और बुनियादी सुविधाओं की योजनाएं चलती हैं। अब केंद्र सरकार एक तरफा कानून बनाकर यह तय करना चाहती है कि राज्य अपनी जमीन पर क्या टैक्स लगाएंगे और क्या नहीं। इतना ही नहीं प्रस्तावित धारा 9 डी के तहत पहले से बकाया राशि को भी माफ करने की बात कही जा रही है। यह कदम उन राज्यों के साथ धोखा है जिन्होंने दशकों से खनन के कारण पर्यावरण और विस्थापन की कीमत चुकाई है।
केंद्र का तर्क है कि देश में समान टैक्स ढांचा जरूरी है, लेकिन यह तर्क पूरी तरह भ्रामक है। समानता के नाम पर राज्यों के संवैधानिक अधिकार छीने जाएंगे। खनिज संसाधन संविधान की दूसरी अनुसूची में राज्यों के अधिकार क्षेत्र में हैं। केंद्र को नियामक की भूमिका में रहना चाहिए, मालिक बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। जिस दिन खदान और खनिज वाली जमीनों पर टैक्स की चाबी केंद्र के हाथ में चली जाएगी उस दिन राज्यों की आय का सबसे बड़ा स्रोत सूख जाएगा और इसका सबसे ज्यादा नुकसान छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को होगा। जहां का एक बड़ा हिस्सा खनिज राजस्व पर निर्भर है।
श्री चंद्राकर ने आरोप लगाया कि यह संशोधन निवेश और विकास के नाम पर किया जा रहा है, लेकिन हकीकत में यह कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने की साजिश है। जब केंद्र तय करेगा कि राज्य कितनी लेवी लगा सकते हैं तो राज्य न तो स्थानीय विकास कर पाएंगे और न ही प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा दे पाएंगे। यह केंद्र और राज्य के बीच अविश्वास की खाई को और गहरा करेगा। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग किया है कि वह तुरंत इस जनविरोधी संशोधन को वापस ले। राज्यों के अधिकारों से खिलवाड़ बंद हो। छत्तीसगढ़ की जनता का अपने संसाधनों पर पूरा अधिकार है, इसे छीनने की कोशिश न किया जाए। केंद्र की भाजपा सरकार जिस तरह छत्तीसगढ़ के जल, जंगल, जमीन को अडानी अंबानी को सौंप रही है, उसी तरह अब खनिज संपदा और खनिज संपन्न जमीनों पर कुदृष्टि डाल रही है। इसका हिसाब हर एक छत्तीसगढिया भाजपा सरकार से 2028 में लगी।






