नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर सिटीजन्स के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि उनकी गरिमा, सुरक्षा और सम्मान की रक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर ट्रिब्यूनल उनके बच्चों और बहू-बेटे को संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दे सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बढ़ती उम्र का मतलब असुरक्षा या अपमान के साथ जीवन बिताना नहीं है और हर व्यक्ति को जीवनभर गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें सीनियर सिटीजन्स के ट्रिब्यूनल द्वारा बेटे और बहू को मकान से बेदखल करने के आदेश को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि बेदखली सीनियर सिटीजन्स के भरण-पोषण, सुरक्षा और सम्मान के लिए जरूरी है, तो ट्रिब्यूनल ऐसा आदेश जारी कर सकता है।
लखनऊ के मकान से जुड़ा था मामला
यह मामला लखनऊ के विकास नगर निवासी रवि कांत गुप्ता की अपील से संबंधित था। गुप्ता ने 5 जून 2022 को अपनी स्वयं अर्जित संपत्ति से बेटे को बेदखल करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दिया था।
मामले में यह भी सामने आया कि गुप्ता की 81 वर्षीय मां को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा था। इसके बाद एसडीएम ने 15 नवंबर 2022 को बेटे की बेदखली का आदेश दिया। जिला मजिस्ट्रेट ने 9 अगस्त 2023 को इस आदेश को बरकरार रखते हुए बेटे और बहू को मकान खाली करने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था आदेश
बेटे और बहू ने एसडीएम तथा जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने माना था कि माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 वरिष्ठ नागरिकों को अपनी संपत्ति से बच्चों को सीधे बेदखल करने का अधिकार नहीं देता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों आदेश रद्द कर दिए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को गलत ठहराते हुए कहा कि ट्रिब्यूनल के पास कानून के उद्देश्य को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाने की शक्ति है।
पीठ ने कहा कि अधिनियम की धारा 7 के तहत ट्रिब्यूनल गठित किए गए हैं, जबकि धारा 8 उन्हें सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां प्रदान करती है। वहीं, धारा 27 सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर रोक लगाती है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून का मूल उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण, सुरक्षा और गरिमा की रक्षा करना है। ऐसे में यदि वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए बच्चे को संपत्ति से हटाना आवश्यक हो, तो ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है।
पुराने फैसलों का भी दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर (2021) के फैसले का भी उल्लेख किया। इसमें कोर्ट ने माना था कि माता-पिता या वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए आवश्यक होने पर ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है।
पीठ ने कहा कि यही कानूनी स्थिति बाद में समटोला देवी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2025) और कमलकांत मिश्रा बनाम एडिशनल कलेक्टर (2025) मामलों में भी दोहराई गई।






